लालू होना आसान नहीं

बिहार की राजनीति के दो अध्याय ‬: ‪(1) लालू से पहले का 43 वर्षों का बिहार‬, (2) लालू के बाद का 15 वर्षों का बिहार‬

‪बिहार में असल मानव सभ्यता का विकास और सामाजिक क्रांति लालू के 15 वर्षों में हुई। ‬लालू ने हज़ारों वर्षों से और आज़ादी के बाद 1990 तक के 43 वर्षों में सत्ता पर कुंडली जमाए प्रभावशाली वर्गों को सत्तामुक्त कर दिया था। हज़ारों वर्षों से शासन कर रहे किसी की सल्तनत को आप जनतंत्र की बदौलत हासिल करते है तो लालू से टीस, ईर्ष्या, नफ़रत होना स्वभाविक है।

बड़ी चालाकी अथवा धूर्तता से लालू के पहले और बाद के बिहार का मीडिया द्वारा कभी चर्चा ही नहीं किया गया। यानि 58 वर्ष बिहार में ग़ैर-लालू सरकार रही लेकिन उनके पहले और बाद की सभी समस्याओं का ज़िम्मेवार लालू को ठहराया जाता है। बिहार में बाढ़ , सुखाड़ या जल-जमाव हो, व्रजपात हो, चमकी बुखार हो, कालाज़ार हो, कुशासन हो, पलायन-बेरोज़गारी हो, बदहाल शिक्षा-स्वास्थ्य व्यवस्था हो, सैंकड़ों घोटाले हो, अपराध, बलात्कार, व्याभिचार और भ्रष्टाचार हो सभी 58 सालों का दोष लालू के नाम मढ़ दिया जाता है।

‪लालू के बाद का बिहार मीडिया प्रायोजित सुशासन है‬। विगत वर्षों में कथित सुशासन की जो असल बहार देश देख रहा है वह दरअसल सोशल मीडिया की देन है। अन्यथा तो नीतीश कुमार ने मीडिया के चंद लोगों को ही PR का ठेका दिया हुआ है।

इसलिए कहता हूँ लालू होना आसान नहीं। उनके वजूद को मिटाने की तमाम कोशिशों के बावजूद आज भी पूरी राजनीति उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है। क्योंकि बिहार की बहुसंख्यक जनता जानती है लालू ने उन्हें क्या दिया है। अपने विचार और सिद्धांत पर टिके लालू की यही असल कमाई है।

Sunil Kumar Dhangadamajhi

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