आजादी का अमृत महोत्सव : भारत में जीवन प्रत्याशा पहुंच चुकी है 32 वर्ष से 71 वर्ष तक

विवेक शुक्ला

निःसंदेह बीते 75 सालों का सिंहावलोकन करें, तो देशवासियों की सेहत में बड़े पैमाने पर सुधार हुआ है. तथ्यों के आईने में देखें तो वर्ष 1947 में देश में लोगों की जीवन प्रत्याशा औसतन लगभग 32 वर्ष थी, जो अब बढ़कर लगभग 71 साल हो चुकी है. 1979 में देश को सैकड़ों साल बाद स्मालपॉक्स या चेचक से छुटकारा मिला, 1994 में प्लेग की बीमारी का उन्मूलन हुआ. इसी तरह विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 27 मार्च, 2014 को भारत को पोलियो मुक्त देश का प्रमाण पत्र दे दिया, तो वहीं सन 2016 में राष्ट्रीय स्तर पर मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम की घोषणा की जा चुकी है.

इसी तरह विभिन्न रोगों के उन्मूलन के लिए केंद्र सरकार की तरफ से अनेक योजनाएं संचालित की जा रही हैं. वहीं शिशु मृत्यु दर और और प्रसव के दौरान महिलाओं की मृत्यु दर में भी अतीत के कई दशकों की तुलना में बड़े पैमाने पर कमी दर्ज की गयी है. स्पष्ट है, आधुनिक मेडिकल साइंस में हुई प्रगति के अलावा देश के स्वास्थ्य संबंधी ढांचे में भी काफी सुधार हुआ है, जिसका सिलसिला जारी है. आज अपने देश में 700 से ज्यादा मेडिकल कॉलेज व 770 से अधिक नर्सिंग कॉलेज हैं. अबतक देश में 24 ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स) के निर्माण हो चुके हैं.

कोविड-19 के खिलाफ जीती जंग

दुनियाभर में अमेरिका के अव्वल नंबर के स्वास्थ्य तंत्र (हेल्थ सिस्टम) की कोविड-19 ने बखिया उधेड़ दी थी, तो वहीं इस जानलेवा संक्रमण को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र और राज्य सरकारों ने मिलकर एक सुनियोजित स्वास्थ्य नीति के तहत परास्त कर दिया. यह सब देखकर और जानकर दुनिया के संपन्न और विकसित देश (जिसमें अमेरिका और यूरोपीय देश शामिल हैं) आश्चर्य में पड़ गये. तभी ‘भारत बायोटेक’ ने स्वदेश निर्मित कोविड-19 रोधी वैक्सीन-कोवैक्सीन का निर्माण इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च और नेशनल इंस्टीट्यूट आफ वायरोलॉजी के सहयोग से किया, जिसकी गूंज दुनियाभर ने सुनी. इसके अलावा कोविशील्ड नामक वैक्सीन भी देश में उपलब्ध रही.

कोविड-19 के खिलाफ जंग जीत कर भारत ने दुनिया को यह दिखा दिया कि यहां का स्वास्थ्य तंत्र और जनता की इच्छाशक्ति दुनिया के किसी विकसित या समृद्ध देश से कम नहीं है. कोविड-19 के प्रकोप को नियंत्रित करने में केंद्र सरकार के रणनीतिक-कौशल के साथ राज्य सरकारों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही. इस संदर्भ में देश के सर्वाधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में कोविड-19 को नियंत्रित करने के लिए ऐसा प्रबंधन किया गया, जिसकी तारीफ दुनियाभर में हुई.

180 देशों को वैक्सीन की मदद

भारत ने कोरोना काल के दौरान 180 से ज्यादा देशों को दवाएं और वैक्सीन्स उपलब्ध कराकर दूसरे देशों के प्रति अपने दायित्व को निभाया, जिसकी सराहना अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी की. भारत का कोविड के खिलाफ टीकाकरण विश्व के सबसे बड़े वैक्सीनेशन अभियान में शुमार हो चुका है, जिसके अंतर्गत 220 करोड़ से अधिक वैक्सीन्स लगायी जा चुकी हैं. जनवरी 2021 में भारत में टीकाकरण अभियान शुरू हुआ था.

कोविड-19 रोधी टीकाकरण अभियान को सफल बनाने में डिजिटल को-विन एप की महत्वपूर्ण भूमिका रही. इस एप ने अलग-अलग टाइम स्लॉट में टीके और टीकाकरण केंद्रों के चयन को सुनिश्चित करने में मदद की. पिछले नौ सालों में लगभग 9 हजार से अधिक जन-औषधि केंद्र खुल चुके हैं. इन केंद्रों पर मिलने वाली जेनेरिक दवाएं आधे से भी कम कीमतों पर उपलब्ध हैं, जिनका लाभ जरूरतमंदों को मिल रहा है.

चिकित्सकीय उपलब्धियां और ‘मेडिकल टूरिज्म’

चिकित्सा क्षेत्र में पिछले 75 सालों की उपलब्धियों का यह नतीजा है कि आज देश के स्तरीय हॉस्पिटल्स में विदेशों से मरीज इलाज कराने आ रहे हैं. ऐसा अनुमान है कि बीते साल लगभग 7 लाख, 50 हजार से अधिक विदेशी भारत में इलाज कराने आये. हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार, ऐसा इसलिए है, क्योंकि दुनिया के विकसित देशों की तुलना में भारत में विभिन्न रोगों के इलाज का खर्च लगभग 20 प्रतिशत कम है. इस कारण खासकर अफ्रीका महाद्वीप के देशों, मध्य पूर्व के मुल्कों और एशिया के अन्य विकासशील देशों से मरीज इलाज कराने भारत आ रहे हैं. इस बढ़ते मेडिकल टूरिज्म का एक महत्वपूर्ण कारण यह है कि भारत के उच्चस्तरीय अस्पतालों में विश्व स्तरीय चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं. अंग प्रत्यारोपण (ऑर्गन ट्रांसप्लांट्स) के क्षेत्र में यहां लिवर, किडनी और कॉर्निया आदि अंगों का ट्रांसप्लांट दुनिया के अनेक देशों की तुलना में कहीं ज्यादा किफायती है. इसके अलावा विभिन्न प्रकार के कैंसर, हृदय रोगों जैसे कोरोनरी आर्टरी डिजीज और दिल के वॉल्व में खराबी आदि और मस्तिष्क एवं रीढ़ की हड्डी से संबंधित समस्याओं (न्यूरोलॉजिकल एंड स्पाइनल प्रॉब्लम्स) के उपचार की लागत भी भारत में अन्य देशों की तुलना में काफी कम है.

डॉक्टरों की संख्या में हुआ इजाफा

प्रेस इनफार्मेशन ब्यूरो (पीआइबी) द्वारा उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, नरेंद्र मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल में देश में चिकित्सकों और नर्सों की संख्या में बड़े पैमाने पर वृद्धि हुई है. पीआइबी के अनुसार, 2012 तक देश में चिकित्सकों की संख्या लगभग 8 लाख 83 हजार थी, जो 2021 में 13 लाख तक पहुंच गयी. इसी तरह 2012 तक देश में नर्सों की संख्या लगभग 21 लाख थी, जो 2021 में 33 लाख से ज्यादा हो चुकी है.

2025 तक टीबी मुक्त भारत का लक्ष्य

केंद्र सरकार ने सन 2025 तक देश को टीबी से मुक्त करने का संकल्प लिया है. हालांकि, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2030 तक दुनिया भर से टीबी के उन्मूलन का लक्ष्य निर्धारित किया है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस लक्ष्य को 2025 तक ही पूरा कर लेना चाहते हैं.

कुछ चुनौतियों पर विजय पाना है

यह सही है कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान देश में संक्रामक रोगों (इंफेक्शस डिजीजेज) को नियंत्रित करने में काफी हद तक सफल रहा है. इसके बावजूद गैर संक्रामक या गैर संचारी रोगों पर कारगर नियंत्रण करना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है. जैसे पिछले डेढ़ दशक में गैर संचारी या फिर अस्वास्थ्यकर जीवनशैली से संबंधित बीमारियां जैसे उच्च रक्तचाप और हृदय रोग, मधुमेह, लिवर और किडनी आदि से संबंधित समस्याओं के मामले बढ़त पर हैं. एक अध्ययन के अनुसार, देश में प्रत्येक चार में से एक व्यक्ति उच्च रक्तचाप की समस्या से ग्रस्त है तो वहीं इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च द्वारा किये गये एक अध्ययन के अनुसार, भारत में संप्रति 10 करोड़, 10 लाख व्यक्ति मधुमेह से ग्रस्त हैं.

इसी तरह विभिन्न प्रकार के कैंसर जैसे लिवर कैंसर,ब्लड कैंसर और लंग कैंसर आदि भी मेडिकल साइंस के लिए अनेक मामलों में चुनौती बने हुए हैं. हालांकि, विशेषज्ञ डॉक्टरों, स्वास्थ्य विशेषज्ञों और स्वास्थ्य संबंधित नीति निर्माताओं ने इस तरह की चुनौतियों को स्वीकार कर गैर संचारी रोगों को नियंत्रित करने के प्रयास शुरू कर दिये हैं. फिर भी इस संदर्भ में लोगों को अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने की जरूरत है.

(लेखक सीनियर हेल्थ जर्नलिस्ट हैं.)

Sunil Kumar Dhangadamajhi

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