आचार्य श्री ने दिया संघ को अनमोल रत्न -मुनि प्रशांत
कटिहार (बर्धमान जैन): आचार्य श्री महाश्रमणजी के सुशिष्य मुनिश्री प्रशांत कुमारजी मुनिश्री कुमुद कुमारजी के सान्निध्य में युवाचार्य वर्धापना समारोह आयोजित हुआ जनसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री प्रशांत कुमारजी ने कहा – कुम्हार मिट्टी को खोजता है। जिससे बर्तन को बना सकें।कलाकार पत्थर को खोजता है। जिससे प्रतिमा का निर्माण कर सके।किसान बीज को खोजता है। जिससे फसल पैदा कर सके।गुरु शिष्य की खोज में रहते हैं। योग्य शिष्य मिलें जिसे मैं अपना उत्तराधिकार दें सकूं। उपयुक्त तत्व के निर्माण में ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आचार्य श्री महाश्रमणजी ने भी अपनी दृष्टि से उपयुक्त का निर्माण करके उसे संघ के भाल पर प्रतिष्ठित कर दिया।युवाचार्य मनोनयन आचार्यों का एक अधिकार होता है। तेरापंथ की परम्परा आचार्य अपने पीछे युवाचार्य मनोनीत करते है। इसके लिए किसी की सलाह लेने, परामर्श लेने की जरूरत नहीं होती है।स्व निर्णय एवं स्व चिंतन से कार्य किया जाता है।जिसको भी आचार्य ने यह पद दिया उसे सारा संघ सहर्ष स्वीकार करता है।छोटा या बड़ा, विद्वान या कम पढ़ा-लिखा जो भी होता है वो सबके लिए मान्य है।युवाचार्य महावीर कुमार जी प्रारम्भ से ही आचार्य श्री महाश्रमणजी की सन्निधि में रहें है। आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी की भी विशेष कृपा प्राप्त की है।पात्र का योग्य होना बहुत आवश्यक है। संघनिष्ठा, आचार निष्ठा, विनम्रता, ज्ञान पिपासा,पापभीरुता से इन्होंने बहुत कुछ पाया है। गुरु की पारखी नजर ने परख कर धर्मसंघ को अनमोल रत्न प्रदान किया।

मुनिश्री कुमुद कुमारजी ने कहा – आचार्य श्री भिक्षु के जन्म त्रिशताब्दी वर्ष सम्पन्नता के अवसर को अति विशेष अवसर बना दिया आचार्य श्री महाश्रमणजी ने। युवाचार्य महावीर कुमार जी में विनय, समर्पण एवं ज्ञान की त्रिवेणी है।सहजता, सरलता के साथ-साथ मधुर संगायक है। हंसमुख चेहरा सबके मन को आनंदित कर देता है।कालूगणी ने साधुओं को शिक्षा प्रदान करते हुए फरमाया था कि आचार्य पद के योग्य बनें उम्मीदवार न बने। मुनिश्री महावीर कुमार जी पद के योग्य बनें। आचार्य श्री महाश्रमणजी ने संघ को शुभ भविष्य प्रदान कर दिया। तेरापंथ सभा अध्यक्ष विमल बैंगाणी, नेपाल बिहार सभा अध्यक्ष विरेंद्र संचेती, तेरापंथ युवक परिषद कोषाध्यक्ष राहुल सुराणा, महिला मंडल से श्रीमती निक्की पुगलिया ने विचारों की अभिव्यक्ति दी। कार्यक्रम का कुशल संचालन मुनिश्री कुमुद कुमारजी ने किया।

