छत्तीसगढ़: गरियाबंद जिले के जंगली क्षेत्र में गर्मी का महीना शुरू होते ही आदिवासी परिवार द्वारा तेंदू पत्ता संरक्षण का कार्य तीव्र गति से शुरू हो गया है। खासकर वनांचल में यह कार्य ज्यादा होता है। जिससे यहां के रहवासियों को फायदा मिलता हैं। वहीं इस बार कोरोना महामारी बीमारी के कारण सभी आवश्यक नियम एवं सरते को मद्दे नजर रखते हुए तेंदू पत्ता संरक्षण का कार्य कर रहे है। जिसके चलते इस कार्य में लगे लोगों द्वारा मास्क पहनकर एवं साबुन व सेनेटाइजर से बार – बार हाथ धोने संबंधित कार्य किए जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ राज्य में तेंदूपत्ता को हरा सोना माना जाता है। सरकार के इस महत्वाकांक्षी योजना से संग्राहकों को कई तरह के लाभ मिलते हैं।

आपको बता दें की राज्य के कई जिलों में जैसे ही लॉकडाउन चालू हुआ, कई लोग रोजगार के लिए तरस रहे थे। अब तेंदू पत्ता संरक्षण का कार्य जैसे ही शुरू हुआ क्षेत्र के बेरोजगार लोगों को रोजगार मिल गयी। तेंदू पत्ते तोड़ने में महिलाएं भी बढ़चढ़ कर पत्ते तोड़ने का कार्य करती हैं। यह कार्य सुबह 5 बजे से दोपहर 12 एक बजे के आसपास तक चलता है। क्योंकि क्षेत्र में बढोतरी तापमान को देखते हुए लोग सुबह ही जंगल की ओर भूखे – प्यासे तेंदू पत्ता संरक्षण के लिये निकल पड़ते है , और दोपहर तक घर की ओर परिस्तान करते है। क्षेत्र वासियों का कहना है कि तेंदूपत्ता की तोड़ाई से प्रत्येक मजदूर को प्रतिवर्ष 6 से 7 हजार रुपये तक का कमाई हो जाता है। वही क्षेत्र के मुंशियों से व तेंदू पत्ता तोड़ने वाले मजदूरों से मिली जानकारी के अनुसार एक गड्डी के रूप में तेंदू पत्ते को तैयार किया जाता है , जिसमें 25 – 25 करके उल्टा – पुल्टा बांधा जाता है। टोटल 50 की गड्डी बनाई जाती है, और 100 गड्डियों का 490 रुपये बनता है।
छत्तीसगढ़ स्टेट ब्यूरो चीफ उमेश यादव की रिपोर्ट Yadu News Nation

