मां भवानी मंजू शक्ति सेवा ट्रस्ट में प्रवचन का आयोजन

अपने भावों को हमेशा शुद्ध एवं उच्च रखें -मुनि प्रशांत

सिलीगुड़ी (वर्धमान जैन): मुनि श्री प्रशांत कुमार जी मुनि श्री कुमुद कुमार जी का मां भवानी मंजू शक्ति सेवा ट्रस्ट में प्रवचन का आयोजन हुआ। जनसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री प्रशांत कुमार जी ने कहा – आगम सूत्रों की अनेक गाथाएं अपने आप में मंगलकारी एवं विघ्ननाशक है। इनका उच्चारण करने से बहुत सारी बाधाएं अपने आप दूर हो जाती है। मंगलाचरण हमें संदेश देता है कि हमारा आचरण मंगल हो। हमारा कार्य एवं व्यवहार स्वयं एवं दूसरों के लिए अमंगल न हो। तीर्थंकर प्रभु की वाणी हम आचार्य,साधु -साध्वी के माध्यम से सुनते हैं। दुनिया में बहुत सारे पदार्थ को मंगल माना जाता है लेकिन इन सबमें सबसे बड़ा मंगल धर्म होता है। धर्म से बड़ा कोई मंगल नहीं होता है। धर्म उत्कृष्ट मंगल होता है क्योंकि उससे हमारा जीवन मंगलमय होता है। साधु का जीवन मंगलमय त्यागमय होता है इसलिए उनसे श्रावक का जीवन मंगलमय होता है।

मंगलपाठ हमारे जीवन को सकारात्मकता देता है। किसी को सताकर, मारकर, नुकसान करके मंगल की कामना करना व्यर्थ है। हमारे भाव मंगल एवं पवित्र रहें। नवकार मंत्र के प्रति श्रद्धा होनी चाहिए। तीर्थंकर की भक्ति करने,भाव वंदन करने से हमारे कर्म कटते हैं। उनकी शक्ति अध्यात्म की शक्ति होती है। अनेक देवी देवता शासन की सेवा करते हैं। जो धर्म के प्रति अच्छी भावना रखते हैं वो खुद का मंगल करते हैं। तीर्थंकर की सेवा करने वाले देवी देवता धन्य हो जाते हैं। किसी भी देवी देवता की आसातना,अनादर नहीं करना चाहिए। सभी देवी देवताओं में शक्ति होती है, लेकिन त्याग करने का सामर्थ्य नहीं होता है। श्रावक गुणस्थान की दृष्टि से देवताओं से भी ऊंचा हो जाता है। अपने जीवन में त्याग बढ़ाना चाहिए जिससे आत्मा की खुराक बढ़ती है। शरीर की शक्ति भोजन एवं दवाई द्वारा बढ़ती है। धर्म, साधना,संयम से भीतर की शक्ति बढ़ती है। मंदिर में आने वाला व्यक्ति अच्छे भावों से आता है। अपने भावों को हमेशा उच्च एवं शुद्ध रखें। माताजी कर्म से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करें। सभी अपना आत्म कल्याण करके मोक्ष को प्राप्त करें।

मुनि श्री कुमुद कुमार जी ने कहा – दुनिया में शक्ति का महत्व होता है। शक्ति की सदैव पूजा होती रही है। व्यक्ति अपने भीतर की शक्ति को बढ़ाएं। शरीरबल से अधिक अपने मनोबल को बढ़ाने का प्रयास करें। शरीरबल, बुद्धिबल का अपना महत्व होता है। मनोबल का महत्व इन दोनों से अधिक होता है। मनोबल जप- तप- एवं ध्यान से बढ़ता है। जपाराधना करने के साथ अपने अहंकार को भी छोड़ना होता है। तप में आसक्ति छोड़ने से ही तप का यथार्थ लाभ मिलता है। आसक्ति कर्म बन्धन का कारण है। सही तरीके से जप -ध्यान एवं तप की आराधना करने से आत्मा की विशुद्धि होने के साथ साथ आत्मा का आभामंडल भी पवित्र बनता है। जीवन में अध्यात्म की साधना चलनी चाहिए। मां भवानी मंजू शक्ति सेवा ट्रस्ट के अध्यक्ष मदन मालू ने विचार व्यक्त किए। दुर्गा वाहिनी ने गीत प्रस्तुत किया।

Sunil Kumar Dhangadamajhi

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