✒️प्रद्युम्न साहु
कहा जाता है कि अश्विन मास देवी-देवताओं का माह है। इस महीने में खासकर पश्चिम ओडिशा के विभिन्न स्थानों पर बली यात्रा का आयोजन होता है। लेकिन सोनपुर (सुवर्णपुर) में होने वाली बली यात्रा पूरी तरह से भिन्न है। यहां बली का मतलब जीव-जंतुओं को मारना मात्र नहीं समझ सकते हैं। यहां बली मतलब बलशाली, सबसे अधिक ताकत वाला। ढ़ोल, निशान और गिनी (मंजीरा) को बजाते हुए नाच-नाच कर एक साधारण मनुष्य महाप्रभु में परिवर्तित हो जाता है। जिस ढ़ोल के डिग डिगो (ध्वनि) पर बली चांग-चांग ताल पर साधारण मनुष्य देवता बन जाता है। सुवर्णपुर की बली यात्रा में बज रहे उस ढ़ोल को “चेपटा ढ़ोल” कहा जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि इसका आकार अन्य ढ़ोल की तरह का नहीं होता है। इस ढ़ोल का आकार चपटा है। साधारण भाव से देखकर कोई इस ढ़ोल एक टूटा-फूटा ढ़ोल ही कहेगा। परन्तु इस ढ़ोल का महात्म्य बहुत अधिक है।
किंवदंती के अनुसार एक बार सोनपुर महाराज, “चेपटा ढ़ोल” को पुराना हो गया मानकर अर्धरात्रि को बाढ़ग्रस्त महानदी में विसर्जित करवा दिए। बाढ़ के पानी के साथ ढ़ोल को समुद्र की ओर बह जाना चाहिए था, लेकिन सूर्योदय के समय “चेपटा ढ़ोल” सोनपुर के राजाघाट के निकट बाढ़ के बहाव के बीच एक जगह स्थिर होकर तैर रहा था। इस ढ़ोल में दैवी शक्ति होने का अनुभव कर महाराज ने “चेपटा ढ़ोल” को वापस मंगवा लिया और उसकी पूजा की व्यवस्था करवायी।
वाद्य यंत्रों में “चेपटा ढ़ोल” श्रेष्ठ है ऐसी मान्यता है।
काले-सफेद छतर (छाता) को लेकर “चेपटा ढ़ोल” पर चढ़ कर महाबली के नाचने का दृश्य जिसने नहीं देखा वो “चेपटा ढ़ोल” के महात्म्य की कल्पना भी नहीं कर सकता है। इस ढ़ोल से निकलने वाली आवाज से दिल के अंदर एक भिन्न प्रकार की कंपन पैदा होती है।
महाबली के साथ लोग “चेपटा ढ़ोल” के दर्शन कर जगत कल्याण की कामना करते हैं सोनपुर के श्रद्धालु भक्त। यह “चेपटा ढ़ोल” कितना पुराना है कह पाना मुश्किल है। परन्तु अपनी आवाज से मनुष्य को देवता बनाने वाला “चेपटा ढ़ोल” वाद्य यंत्रों में श्रेष्ठ होने की वजह से आज भी पूजा पा रहा है और अनन्त काल तक पाता रहेगा।
सोनपुर, ओड़िशा
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