उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव को मिल गई ओवैसी की काट, मुस्लिम वोट बैंक को ऐसे संभालेगी सपा

लखनऊ: बिहार में पांच सीटें पाकर जब असदुद्दीन ओवैसी ने अपनी पार्टी को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उतारने का ऐलान किया तो सबसे बड़ा झटका समाजवादी पार्टी को ही लगा था। क्योंकि, संदेश स्पष्ट था कि ओवैसी मुस्लिम वोट काटने आ रहे हैं और नुकसान अखिलेश यादव को ही होगा। भाजपा-विरोधी हमेशा से ओवैसी को बीजेपी का एजेंट साबित करने की भी कोशिशों में लगे रहते हैं, चाहे बिहार में चुनाव के बाद ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन के विधायक स्पीकर के पद के लिए विपक्ष के साथ ही क्यों ना खड़े हो चुके हों। लेकिन, लगता है कि ओवैसी के चलते अखिलेश यादव को जो शुरुआती चिंता हुई थी, उसकी काट उन्होंने खोज ली है। उन्हें अपने मुस्लिम-यादव वोट बैंक को एकजुट रखने का फॉर्मूला हाथ लग चुका है।

भाजपा-विरोधी लोगों का मानना है कि हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी उत्तर प्रदेश चुनाव में समाजवादी पार्टी के मुस्लिम-यादव समीकरण को तोड़ना चाहते हैं, जो कि प्रदेश में उसकी चुनावी गणित का सबसे मजबूत चुनावी आधार माना जाता है। यूपी में मुसलमानों की आबादी कुल जनसंख्या का करीब पांचवा हिस्सा है तो यादवों की अनुमानित आबादी 9 से 10 फीसदी के आसपास कहा जाता है। यानी 30 फीसदी एकजुट वोट बैंक ही सपा का सबसे ताकतवर हथियार रहा है। जाहिर है कि ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन के यहां की चुनावी बिसात पर जोर लगाने से सबसे ज्यादा नुकसान अखिलेश यादव और उनकी पार्टी को होने का ही अनुमान है।

बिहार विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम के प्रदर्शन को देखने से अंदाजा लगता है कि खासकर युवा मुसलमानों में उत्तर भारत में भी असदुद्दीन ओवैसी अपने धारदार भाषणों से काफी प्रभाव डाल रहे हैं। इस बात में कोई दो राय नहीं कि यूपी-बिहार में युवा मुसलमानों के एक वर्ग में ओवैसी के लिए गजब दीवानगी रही है। अपनी इसी पैठ को चुनाव में भुनाने के लिए हैदराबाद के सांसद कहते हैं कि हालांकि, अखिलेश यादव और उनके पिता मुलायम सिंह यादव मुस्लिमों की मदद से ही राज्य के मुख्यमंत्री बन चुके हैं, लेकिन उनके पास मुसलमानों के लिए संतरी और चपरासी जैसे पदों से ज्यादा देने के लिए कुछ भी नहीं रहा है। कुल मिलाकर ओवैसी अखिलेश को सिर्फ यादवों का और खुद को मुसलमानों का अपना नेता साबित करने पर तुले हुए हैं।

अखिलेश यादव युवा मुसलमानों में ओवैसी की लोकप्रियता को वोटों में तब्दील होने से किस हद तक रोक पाते हैं, यह देखने के लिए अभी इंतजार करने की जरूरत है। लेकिन, मुसलमानों के एक वर्ग में उन्होंने अपनी साख कायम रखने की पहल जरूर शुरू की है और उसमें उन्हें शुरुआती कामयाबी भी मिलती दिखाई पड़ रही है। पिछले सालभर में उन्होंने जिस तरह से बसपा और कांग्रेस के कुछ दिग्गज मुस्लिम चेहरों को सपा की साइकिल पर बिठाया है, उससे यह संदेश जरूर गया है कि उत्तर प्रदेश में मुसलमानों का बड़ा तबका अभी भी भाजपा के खिलाफ समाजवादी पार्टी को अपना मुख्य ठिकाना मान रहा है। वैसे यह बात सही है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान के जेल में होने और उनकी बिगड़ती सेहत ने पहले पार्टी की चिंता जरूर बढ़ाई थी, लेकिन धीरे-धीरे पार्टी उस संकट से उबरती हुई दिख रही है।

पिछले कुछ महीनों में जिन दिग्गज मुस्लिम नेताओं ने अखिलेश यादव का नेतृत्व स्वीकार किया है, उमें पांच बार के सांसद सलीम इकबाल शेरवानी भी हैं, जो कि पहले सपा में ही थे, फिर कांग्रेस में शामिल हो गए थे। वे राहुल गांधी के पिता के दोस्त भी रह चुके हैं। पार्टी में आने के बाद से वह अध्यक्ष अखिलेश के साथ कई बार मंच भी साझा कर चुके हैं, जिनमें मार्च में अलीगढ़ में हुआ किसान महापंचायत भी शामिल है। शेरवानी का सपा के लिए इस तरह से बैटिंग करना, ओवैसी के मंसूबों पर पानी फेरने के लिए काफी है। इसी तरह से पूर्वांचल के मुस्लिम नेता सिबगतुल्ला अंसारी और उनके बेटे भी हाल ही में सपा में शामिल हुए हैं।

गाजीपुर के मोहम्दबाद के पूर्व बसपा एमएलए सिबगतुल्ला अंसारी क्षेत्र के कुख्यात अंसारी बंधुओं में सबसे बड़े हैं। बसपा सांसद अफजल अंसारी और मुख्तार अंसारी (बसपा से निकाले गए बाहुबली विधायक) का गाजीपुर और मऊ जिलों में काफी दबदबा है। भले ही अंसारी बंधू राजनीति के अपराधीकरण के सबसे बड़े उदाहरण हैं, लेकिन इनके पास मजबूत वोट बैंक है, जो आने वाले चुनावों में जरूर साइकिल की गति बढ़ाने का काम कर सकती है। इसी तरह से एक और प्रभावी मुस्लिम नेता और सीतापुर के पूर्व बसपा सांसद कैसर जहां भी सपा में शामिल हुए हैं, जो कि ओवैसी की उम्मीदों की धार कुंद करने के लिए काफी अहम हैं।

Sunil Kumar Dhangadamajhi

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