रसनेन्द्रिय विजय की साधना है आयम्बिल -मुनि प्रशांत
कटिहार (बर्धमान जैन): आचार्य श्री महाश्रमणजी के सुशिष्य मुनिश्री प्रशांत कुमारजी मुनिश्री कुमुद कुमारजी के सान्निध्य में तेरापंथ महिला मंडल कटिहार द्वारा अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मंडल द्वारा निर्देशित सामूहिक आयम्बिल का आयोजन किया गया। जनसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री प्रशांत कुमारजी ने कहा – तपस्या विविध प्रकार की होती है। आयम्बिल एक विशेष तप साधना है। इसका बहुत बड़ा महत्व है क्योंकि खाना वह भी एकदम निरस भोजन करना जिससे हमारी आसक्ति कम हो। रसनेन्द्रिय विजय की साधना है आयम्बिल।जीभ पर कंट्रोल करना बड़ा मुश्किल होता है। मनपसंद वस्तु को छोड़ना,मन पर नियंत्रण रखना सहज नहीं है। हजारों हज़ारों लोग इस तप को करते है। कर्म निर्जरा के साथ साथ संकट निवारण, विघ्न निवारण, उपद्रव निवारण के लिए भी आयम्बिल तप किया जाता है। प्राचीन काल में अनेक जगह परम्परा थी कि प्रत्येक घर में हर दिन आयम्बिल होता जिससे दैवीय उपद्रव नही होता। द्वारिका नगरी की सुरक्षा आयम्बिल के कारण से होती रही।नवपद की आराधना आयम्बिल के साथ की जाती है। आयम्बिल के साथ जपयोग साधना के महत्व को बढ़ा देता है। श्रीपाल मैना सुंदरी का जीवन दर्शन कर्मयोग एवं आयम्बिल तप की महत्ता को उजागर करता है। मुनिश्री कुमुद कुमारजी ने कहा – जन्माष्टमी का सम्बंध योगीराज श्री कृष्ण के साथ जुड़ा है। सनातन संस्कृति एवं जैन धर्म दोनों में उनका सम्मानीय स्थान है। श्री कृष्ण के भव में वासुदेव एवं आगामी भव में तीर्थंकर बनना उनकी विशिष्ट आध्यात्मिक भावना का सूचक है। उनके जीवन में आध्यात्मिकता का भाव भरपूर था। उनके इसी भाव के कारण सैकड़ों लोगों ने संयम को अंगीकार किया।उनका सम्यक् दृष्टिकोण हम सबके लिए प्रेरणादायी है। उनके गुण आध्यात्मिक एवं सामाजिक दोनों दृष्टियों से प्रेरक है। हनुमान नाहटा ने बताया – महिला मंडल अध्यक्ष श्रीमती संगीता पटावरी ने विषय प्रस्तुति दी। लगभग 45 साधकों ने आयम्बिल तप आराधना की। महिला मंडल द्वारा सभा,तेयुप, महिला मंडल सदस्यों का आभार व्यक्त किया गया।

