बचपन में मिले संस्कार जीवन का निर्माण करते है -मुनि प्रशांत
सिलचर (बर्धमान जैन): मुनिश्री प्रशांत कुमार जी,मुनिश्री कुमुद कुमार जी के सान्निध्य में तेरापंथ युवक परिषद द्वारा मंत्र दीक्षा का आयोजन हुआ। जनसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री प्रशांत कुमार जी ने कहा – मंत्र दीक्षा संकल्प की दीक्षा है। जीवन में सबसे पहले संस्कार गर्भ में मिलते है। गर्भावस्था में माता को विशेष सावधानी रखनी चाहिए। बचपन में मिले संस्कार जीवन का निर्माण करते है। माता-पिता ही अपना एवं अपने बच्चों का भविष्य बना सकते है तो बिगाड़ भी सकते है। माता-पिता को अपना भविष्य अच्छा बनाना है तो सबसे पहले स्वयं को सजग रहना होगा। जीवन के एवं जैन धर्म के संस्कार मिलने से ही व्यक्तित्व का सम्यक विकास होता है।जीवन को अच्छा बनाने के लिए सद्गुण का विकास होना जरूरी है। प्रातः उठते ही नवकार मंत्र का जाप करना चाहिए। उसे अपना जीवन साथी बना लेना चाहिए। यह मंत्र नहीं अपितु शक्तिशाली महामंत्र है। चार गति संसार एवं मोक्ष को जानने का सटीक तरीका है। चार गति में से मनुष्य गति ही हमारे जीवन को सार्थक बनाती है। अगर उस गति के जीवन में अध्यात्म जुड़ जाए तो जीवन को सार्थक बना लेते है। जीवन में गुण एवं अवगुण दोनों आ सकते है कौन सा संस्कार हमें ग्रहण करना है ये चिंतन करना चाहिए। मंत्र दीक्षा स्वीकार करने वाले ज्ञानार्थी संस्कारी बनकर परिवार एवं समाज का हित करें।

मुनिश्री कुमुद कुमार जी ने कहा – हमारे जीवन में संस्कार का बहुत महत्व है। जितना श्वास का महत्व होता है उतना ही संस्कार का महत्व होता है।बिना संस्कार के जीवन भार भूत बन जाता है। संस्कारी बच्चे भविष्य को सुखद बना देते हैं। ज्ञानशाला जीवन निर्माण की प्रयोगशाला है। बाल्यावस्था में ही संस्कारों का सिंचन मिलने ये ज्ञानार्थी पल्लवित पुष्पित होकर समाज एवं संघ का विकास कर सकते है। प्रशिक्षक एवं उपासक दोनों ही पूर्णरूपेण आध्यात्मिक सेवा देकर बहुत ही अनुकरणीय कार्य कर रहे हैं।
जैकी मरोठी ने बताया कि मुनिश्री प्रशांत कुमार जी ने ज्ञानार्थी को संकल्प स्वीकार करवाएं। तेरापंथ युवक परिषद अध्यक्ष पंकज मालू ने विचारों की अभिव्यक्ति दी। ज्ञानशाला के ज्ञानार्थी ने मंत्र दीक्षा पर नाटक प्रस्तुत किया। ज्ञानशाला प्रशिक्षक एवं ज्ञानशाला के ज्ञानार्थी ने मंत्र दीक्षा पर गीत प्रस्तुत किया। आभार निवर्तमान अध्यक्ष भरत दुगड़ ने किया।

