ज्ञानशाला वार्षिकोत्सव

संस्कार जीवन की अनमोल विरासत -मुनि प्रशांत

कांटाबांजी (वर्धमान जैन): ज्ञानशाला वार्षिक उत्सव के भव्य शालीन आयोजन को सम्बोधित करते हुए मुनि प्रशांत कुमारजी ने कहा- आज का यह ज्ञानशाला कार्यक्रम संदेश ग्रहण करने वाला है। ज्ञानशाला में आने वाले बच्चे जीवन में कुछ विशेष प्राप्त करते हैं ,जो नहीं आते वो लाभ से वंचित रह जाते हैं। ज्ञानशाला हमारे जीवन की प्राथमिक अपेक्षा होती है। ज्ञानशाला में प्राप्त संस्कार जीवन की बुनियाद को सम्यक् बनाते है। आज के युग में बौद्धिक ज्ञान का विकास तो बहुत हुआ लेकिन संस्कारों का विकास कम होता जा रहा है। बच्चे परिवार , समाज एवं देश का भविष्य होते हैं। भविष्य को शुभ बनाने के लिए प्राचीन संस्कृति, सभ्यता ,संस्कार को जीवंत रखना होगा । अपना जीवन कैसे अच्छा बनाएं ? जीवन में आने वाली परिस्थिति का कैसे सामना कर सकें ये शिक्षा देना जरूरी है। मानवता की भावना का बोध कराया जाए, आत्मविद्या का बोध कराया जाए तो भावी पीढ़ी दूसरो के लिए आदर्श बन जाती है। माता-पिता की कमी होती हैं कि वो अगर बच्चों को ज्ञानशाला नही भेजते है तो उन्हे संस्कारी बनाना नहीं चाहते है। बच्चों को संस्कार मिले या ना मिले ये चिंता कई अभिभावको को होती ही नहीं है। जीवन में बुरी आदत भी इसलिए आ जाती है क्योंकि शुरू से ही बच्चे को अच्छे संस्कार नहीं दिए गए। अच्छे संस्कारों को प्राप्त करने के लिए ज्ञानशाला में भेजना आवश्यक है। ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने बहुत ही सुंदर एवं धाराप्रवाह प्रस्तुतियां दी।प्रसिक्षकगण ने अच्छी तैयारी करवाई। श्रम करना, समय देना साधुवाद के पात्र है। बच्चो को कंट्रोल करना मुश्किल होता है। सीखाना, याद करवाना मुश्किल होता है। गुरुदेव श्री तुलसी ने भविष्य को देखा, समझा और यह उपक्रम ज्ञानशाला का प्रारम्भ किया। बच्चो को जैसा वातावरण मिलता है वैसा सीखते है।घर का परिवेश अच्छा रखना चाहिए। अभिभावको का जैसा व्यवहार होता है ,वैसा सीखता है। प्रतिदिन घर में माला, सामायिक सप्ताह में एक बार सपरिवार सामूहिक रूप से करें। संस्कार देना माता-पिता के हाथ में है। बच्चों का भविष्य अच्छा होने से समाज का भविष्य अच्छा होता है। जो संदेश नाटिका के माध्यम से मिला है उसे जीवन में लाने का प्रयास करें।

मुनि कुमुद कुमार जी ने कहा- हमारे जीवन में जितना महत्व श्वास का होता है. उतना ही संस्कार का होता है। बीज में वटवृक्ष होता है, पत्थर में प्रतिमा होती है वैसे ही बच्चों में क्षमता योग्यता होती है। उस योग्यता को प्रोत्साहन, प्रेरणा एवं उपदेश मिलने से जीवन का निर्माण हो जाता है। मैने स्वयं के जीवन में गृहस्थ अवस्था में प्रतिदिन ज्ञानशाला के माध्यम से ज्ञान अर्जन किया। पारिवारिक सदस्यों की दीक्षा, माता-पिता द्वारा प्रदत्त संस्कार एवं ज्ञानशाला के सदसंस्कारो के कारण आज मुनि अवस्था में साधना कर रहा हूँ। बच्चो की ज्ञानशाला की तरह बडो के लिए भी ऐसा कुछ उपक्रम चले जिससे युवा एवं प्रोढ़ पीढी भी अधिक आध्यात्मिक एवं संस्कारी जीवन जिए। हमारा जीवन ऐसा हो कि स्वयं को गर्व हो, परिवार एवं समाज को गर्व का अनुभव हो।

कार्यक्रम का शुभारम्भ हमारी ज्ञानशाला वंडरफूल गीत से हुआ। सभा अध्यक्ष युवराज जैन ने स्वागत भाषण प्रस्तुत किया। ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने पानी , बिजली के अपव्यय से होने वाले नुकसान एवं समस्या की सुन्दर प्रस्तुति देते हुए पानी-बिजली बचाओ की सीख दी। पेड की हमारे जीवन में उपयोगिता को दर्शाते हुए पेड़ को बचाने की शिक्षा परिसंवाद से दी गई। शादी में फूलो का बेहिसाब उपयोग ,आडम्बर ,पैसो का प्रदर्शन का समाज पर पडने वाला दुष्प्रभाव जीवंत तरीके से बताया गया। मासूम बच्चो द्वारा गुरुदर्शन , प्रतिवर्ष चातुर्मास की प्राप्ति एवं ज्ञानशाला को सप्ताह में छः दिन लगाने की मांग की गई । संस्करो का अभाव नशे का प्रभाव परिसंवाद ,ज्ञानशाला का आकर्षण परिसंवाद को लोगो ने खूब सराहा । ज्ञानशाला जाना है गीत की शानदार प्रस्तुति हुई । मोर्डन सास संस्कारी बहु का संवाद ने की अभिव्यक्ति हुई ।प्रांतीय सभा अध्यक्ष मुकेश जैन , महासभा क्षेत्रिय प्रभारी केशव जैन ने विचारो की प्रस्तुति दी । तेरापंथ सभा कांटाबांजी द्वारा प्रशिक्षकगण का सम्मान किया गया। ज्ञानशाला के ज्ञानार्थीयो को प्रांतीय सभा द्वारा सम्मान किया गया। कार्यक्रम का कुशल संचालन श्रीमति स्मिता जैन एवं रितु जैन ने किया । आभार ज्ञापन श्रीमति बोबि जैन ने किया ।

Sunil Kumar Dhangadamajhi

𝘌𝘥𝘪𝘵𝘰𝘳, 𝘠𝘢𝘥𝘶 𝘕𝘦𝘸𝘴 𝘕𝘢𝘵𝘪𝘰𝘯 ✉yadunewsnation@gmail.com

http://yadunewsnation.in