तप से जागृत होती भीतर की शक्ति -मुनि प्रशांत
कांटाबांजी (वर्धमान जैन): मुनि प्रशांत कुमार जी के सान्निध्य मुनि कुमुद कुमार जी की प्रेरणा से तेरापंथ सभा द्वारा सामूहिक एकासन-जप अनुष्ठान आराधना हुई। जनसभा को सम्बोधित करते हुए मुनि प्रशांत कुमारजी ने कहा- कांटाबांजी में आज दूसरी बार सामूहिक एकासन आराधना हुई। जप-तप आराधना निर्जरा के लिए की जाती है। निर्जरा होने से कर्मो से मुक्ति मिलती है। कर्म मुक्ति ही संसार से मुक्ति है। भारतीय संस्कृति में सदियो से ऋषि-मुनियो ने तपस्या, साधना कर संसार मुक्ति का जीवंत संदेश दिया। कठिन से कठिन तपाराधना कर आत्म संयम, इन्द्रिय संयम कर सांसारिक भोग-विलास से विरक्ती की साधना की। जन्म लेने वाला हर प्राणी मृत्यु को प्राप्त करता है। जन्म-मरण का ये सिलसिला अनादि काल से चला आ रहा है। जब तक बंधे हुए कर्मो को पूर्ण क्षय नही किया जाता है तब तक ये संसार भ्रमण का क्रम चलता रहता है। जन्म-मरण का मतलब दुख का चक्र। दुख मुक्ति पाने के लिए दुख प्राप्ति के कारण को दूर करना होगा। दुख व्यक्ति स्वयं ही दूर कर सकता है, दूसरे व्यक्ति तो निमित बन सकते हैं। दुख मुक्ति एवं कर्म निर्जरा के अनेक प्रकार है, विशेष कर तप के साथ जप का योग । उससे भीतर की शक्ति जागृत होती है। वर्तमान एवं भविष्य आनन्ददायक बनता है। जैन धर्म में अनेक प्रकार के तप है जिसमें एकासन विशिष्ट तप है, कम खाना एवं समयावधि में पूर्ण करना। वर्तमान समय में भोगवादी, पदार्थवादी संस्कृति ने मानसिकता को विकृत बना दिया है। असंयम बढ़ता जा रहा है जिसके कारण अपराध का ग्राफ भी बढ रहा है। अध्यात्मिकता का भाव जगने से ही संस्कृति सुरक्षित रह सकती है। कुमुद मुनि ने अथक परिश्रम कर श्रावक समाज को सामूहिक एकासन के लिए प्रेरित किया है। कर्मनिर्जरा में सहभागी बने है।

मुनि कुमुद कुमार जी ने कहा- तप करना कठिन होता है क्योंकि आहार संज्ञा प्राणी की मौलिक मनोवृति होती है। जन्म से लेकर मरण तक व्यक्ति संसारी गतिविधियों में लिप्त रहता है। धार्मिकता की भावना होने से ही जीवन में परिवर्तन आता है। एकासन का तप करना खाद्य संयम, जीभ संयम का प्रयोग है। चातुर्मास में विभिन्न प्रकार के तप किए जाते है। बडा तप प्रत्येक व्यक्ति नहीं कर सकता इसलिए छोटे-छोटे तप प्रयोगों से व्यक्ति कर्म निर्जरा कर लेता है। तप के साथ ध्यान, जप, स्वाध्याय करने से भावों मे उच्चता एवं शुद्धता बढ जाती है। मन का जुडाव शरीर से हटकर आत्मतत्व के साथ बढ़ता है। जप अनुष्ठान करने से पूर्व मन को मंत्र शक्ति के साथ जुडने का सुझाव देने से मंत्र की शक्ति भीतर की चेतना को अधिक सक्रिय बनाती है।
मीडिया प्रभारी अविनाश जैन ने बताया- कांटाबांजी मे दूसरी बार सामूहिक एकासन ने स्वयं का रिकॉड तोडकर 300 से अधिक एकासन हुए। सभा मंत्री सुमीत जैन ने मुनिद्वय, प्रायोजक कवाड परिवार का आभार व्यक्त किया। मुनिश्री के साथ साधकों ने सामूहिक अनुष्ठान में सहभागी बनें। सामूहिक रूप से एकासन का प्रत्याख्यान मुनि श्री द्वारा करवाया गया।

