गुरु देते है ज्ञान की रोशनी -मुनि प्रशांत
कांटाबांजी (वर्धमान जैन): मुनि प्रशांत कुमार जी ने जनसभा को सम्बोधित करते हुए कहा-ज्ञान हमारे जीवन के लिए बहुत आवश्यक है। ज्ञान के बिना अंधेरा ही अंधेरा होता है। ज्ञान हमारे विवेक को जागृत करता है। अविवेक में व्यक्ति कितने-कितने अकरणीय कार्य कर लेता है। स्वयं के साथ व्यक्ति, परिवार एवं समाज का भी अहित कर देता है। गुरु से ज्ञान की रोशनी मिलती है। गुरु द्वारा प्रदत्त ज्ञान जीवन में बहुत कुछ सीखा देता है। गुरु के प्रति हमारा भाव, विनम्रता का होना चाहिए। विनय धर्म का मूल माना गया हैं। गुरु की आशातना करने वाला ज्ञानावरणीय कर्म का बंध कर लेता है। ज्ञान एवं ज्ञानी की आशातना हमारे ज्ञान प्राप्ति में बहुत बड़ी बाधा है। गुरु से ज्ञान सीखने का प्रयास करना चाहिए। ज्ञान, ध्यान, तप, स्वाध्याय में बाधक नहीं बनना चाहिए। सम्यक ज्ञान से विज्ञान एवं प्रत्याख्यान की दिशा में आगे बढ़ा जाता है। मिथ्याधारणा जीवन को विनाश की ओर ले जाती है गुरु के प्रति श्रद्धा भक्ति भाव सदैव रहना चाहिए तभी ज्ञान वरदान बन जाता है, अन्यथा ज्ञान अभिशाप बन जाता है। विनय से विकास होता है, व्यक्ति आगे बढता है। जज गौतम जी चौरडिया के मन मे गुरु के प्रति अनन्य श्रद्धा का भाव है। तेरापंथ धर्मसंघ का गौरव है कि ऐसे व्यक्ति इस संघ के श्रावक है। अपने जीवन व्यवहार के द्वारा, चरित्र के द्वारा समाज को प्रेरणा दी है। विनम्रता का उदाहरण है गौतम जी हाईकोर्ट के जज पद का दायित्व निभाते हुए गुरुदेव, साधु-साध्वी एवं धर्मसंघ के प्रति अटूट विनम्रता उल्लेखनीय है। धार्मिक संयमी जीवन है। प्रतिदिन सामायिक साधना करना दिनचर्या का अंग है। प्रत्येक श्रावक को प्रतिदिन सामायिक का लक्ष्य रखना चाहिए। गौतम जी चोरडिया पर गुरुदेव तुलसी, गुरुदेव महाप्रज्ञ जी एवं आचार्य श्री महाश्रमण की विशेष कृपा भाव रहा है। तेरापंथ प्रोफेशनल धर्मसंघ की एक विशेष संस्था है। आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी के निर्देशन मार्गदर्शन में यह संस्था प्रारम्भ हुई। वर्तमान में अच्छा कार्य कर रही है।

मुनि कुमुद कुमार जी ने कहा-जीवन में पुण्य एवं पाप बंधन का क्रम चलता रहता है। अपने दृष्टिकोण को सकारात्मक बनाएं जिससे यर्थाथ तत्व का बोध हो सकें। विपरीत दृष्टिकोण से सोचने का नजरिया, जीवन व्यवहार एवं आचरण में करुणा, पाप भीरुता, का अभाव हो जाता है। मन, वचन, काया की प्रवृत्ति से शुभ का बंधन होने से संवर की साधना होती है। पाप आने का द्वार आस्रव नितान्त अशुभ प्रवृति है। व्यक्ति अपनी क्रिया के साथ भाव को शुद्ध एवं उच्च बनाए जिससे आध्यात्मिकता अधिक पुष्ट बन सके। क्रिया से अधिक भावना का महत्व होता है। भावना व्यक्ति को भवसागर पार पहुंचा देती है तो भावना से ही भवभ्रमण बढता है।
उच्च न्यायलय सेवानिवृत जज गौतमचोरडिया ने कहा- गुरु की शक्ति अपार होती है। तुलसीगणी, आचार्य श्री महाप्रज्ञ, आचार्य श्री महाश्रमण जी की असीम कृपा से ही इस मुकाम तक पहुँचा हूँ। ज्ञान के माध्यम से जीवन अच्छा बनता है। ज्ञान से अपने जीवन एवं दूसरो के जीवन को प्रकाशित करते रहें।
मीडिया प्रभारी अविनाश जैन ने बताया-स्वागत भाषण विनोद जैन ने दिया। अविनाश जैन ने टी पी एफ की जानकारी दी। जज गौतम चोरडिया का मोमोटो से सम्मान गजानन एवं मनोज जैन ने किया। प्रतीक वस्त्र के द्वारा सभा अध्यक्ष युवराज जैन ने सम्मान किया। आभार ज्ञापन सुश्री साक्षी जैन ने किया। कार्यक्रम का कुशल संचालन सुश्री अनुपमा जैन ने किया।

