सही दिशा में करें शक्ति का प्रयोग -मुनि प्रशांत
कांटाबांजी (वर्धमान जैन): जनसभा को संबोधित करते हुए मुनि प्रशांत कुमार जी ने कहा – आदमी की इच्छाएं बहुत होती है। अनेक कल्पना होती है। इच्छा तो व्यक्ति बड़ी – बड़ी कर सकता है। इच्छा पर संयम रखना साधना होती है। जैन धर्म में तप -त्याग में धन नहीं मन की शक्ति लगानी होती है। हमारे भीतर शक्ति का भण्डार है उसे जागृत करने के लिए प्रयास करना होता है। ज्ञान , संगीत, भाषण कला में निपुण कोई भी हो सकता है लेकिन अध्यात्म में निपुण बनना असंभव नहीं लेकिन कठिन होता है। क्षमता का विकास होता रहे। इच्छाशक्ति जिसकी प्रबल होती है वहीं अपनी शक्ति का उपयोग करता है।सही दिशा में शक्ति का प्रयोग एवं विकास करें। धर्म करने की, तपस्या करने की, सामायिक करने की भावना जागृत करें शक्ति को जगाएं। धर्म के प्रति मन रम जाता है वहां आनन्द आता है। चातुर्मास में तपस्या होती रहती है। आध्यात्मिक माहौल बनता है। लोगों को प्रेरणा मिलती है। साधु-संतो का प्रवास में धार्मिक माहौल बनता है। तपस्या करने वाले कर्म निर्जरा कर आत्मशक्ति बढ़ाने में सफल होते है।तपस्या करने वाले धन्य होते है। शारीरिक तकलीफ होते हुए भी मनोबल संकल्प बल मजबूत रखते है। तपस्वी की जितनी अनुमोदना की जाए कम है। अपने मनोबल को मजबूत रखते हुए धर्म के पथ पर आगे बढ़ते रहे। सुमीत सभा के मंत्री पद का दायित्व अच्छे ढंग से निभा रहा है। सक्रिय रहकर तपस्या करना ही वास्तविक तपस्या है। श्रीमती सपना ने बहुत हिम्मत, मनोबल का परिचय दिया है।मनोबली व्यक्ति ही तपस्या कर सकता है। श्रीमती प्रिया ने पहली बार तपस्या की है। धर्म में जुड़ाव हुआ है। इतिहास बना कर अनुभव प्राप्त किया है। श्रीमती श्वेता ने जागरुकता के साथ तप किया है। परिवार में धार्मिक संस्कार है। परिवार में सामायिक के अच्छे संस्कार है। युवक परिषद के युवाओं में अच्छी तपस्या हुई है मुझे इस बात की प्रसन्नता है। युवक परिषद अध्यक्ष अंकित ने स्वयं ने तपस्या की है।सारे कार्य करते हुए सामायिक, प्रवचन श्रवण किया है। रास्ते की सेवा में युवकों का बहुत योगदान रहा है। सुमीत जैन ने मनोबल दृढ़ता का कार्य किया है। भावना अच्छी है। सभी को धर्म के प्रति श्रद्धा भाव रखना चाहिए।

मुनि कुमुद कुमार जी ने कहा – सत्य हमारी साधना का मुख्य अंग होता है। जीवन में सरलता, सहजता, पवित्रता नहीं होती है तो क्रियाकाण्ड का कोई महत्व नहीं होता है। भारतीय साहित्य,आगम शास्त्रों में सत्य को बहुत महत्व दिया गया, भगवान के बराबर माना गया। सत्य भाषा के साथ प्रियता का भाव भी होना जरूरी है। अप्रिय सत्य अनर्थ का कारण बन जाता है।भाव एवं भाषा में सरलता होना नितांत आवश्यक है। भाषा व्यवहार में माया का जुड़ाव नहीं होना चाहिए। कथनी करनी की समानता ही व्यक्ति को आदर्श बनाती है। वीतराग पुरुष यथाख्यात चारित्र से सम्पन्न होते है। असत्य बोलने वाला व्यक्ति अनेकों अपराध कर लेता है। व्यक्ति क्रोध, लोभ, भय एवं हास्य के कारण असत्य भाषा का प्रयोग करता है। तप करने वाले तपस्वी तेरापंथ युवक परिषद अध्यक्ष अंकित जैन, तेरापंथ सभा मंत्री सुमीत जैन, सुमीत खेतुरामजी जैन , श्रीमती सपना जैन, श्रीमती प्रियंका जैन, श्रीमती श्वेता कवाड ने आध्यात्मिक उपासना करते हुए तप साधना की है।सबकी अपनी अपनी विशेषताएं हैं।सबके प्रति आध्यात्मिक मंगलकामना।

मीडिया प्रभारी अविनाश जैन ने बताया – तेरापंथ युवक परिषद अध्यक्ष अंकित जैन-8, तेरापंथ सभा मंत्री सुमीत जैन-8, सुमीत खेतुराम जैन-8, श्रीमती सपना दिनेश जैन-8, श्रीमती प्रियंका दीपक जैन -8, श्रीमती श्वेता कवाड़ -8 की तप आराधना सम्पन्न की। पारिवारिक सदस्यगण, तेरापंथ सभा, तेरापंथ युवक परिषद, तेरापंथ महिला मंडल अभातेयुप क्षेत्रीय प्रभारी, स्वयं तपस्वी अंकित जैन ने विचारों की अभिव्यक्ति प्रस्तुत की। अनेकों श्रावक श्राविकाओं ने तप भावना व्यक्त की। बेलपाडा, तुषरा, सिंधी केला, केसिंगा, टिटलागढ, बगुमुंडा क्षेत्र के श्रावक श्राविका उपस्थित थे। सभा द्वारा तपस्वियों का साहित्य द्वारा सम्मान किया गया।

