गुणगान ही नहीं अनुसरण भी करें -मुनि कुमुद
कांटाबांजी (वर्धमान जैन): मुनि प्रशांत कुमार जी के सान्निध्य में 220वां आचार्य श्री भिक्षु चरमोत्सव मनाया गया। जनसभा को संबोधित करते हुए मुनि कुमुद कुमार जी ने कहा – आचार्य भिक्षु महान सत्य शोधक आचार्य थे। शुद्ध साधुत्व का पालन करना और जनता को भी धर्म का शुद्ध स्वरूप बतलाना उनका मुख्य ध्येय था। उन्होंने 260 वर्ष पूर्व जो धर्मक्रांति की थी उसके फलस्वरूप उन्हें भयंकर कष्टों का सामना करना पड़ा। अपने समय में धर्म के बारे में चल रही भ्रांतियों और मिथ्या मान्यताओं का उन्होंने खुलकर प्रतिकार किया जिसे तात्कालीन धार्मिक लोग सहन नहीं कर सकें। आचार्य भिक्षु ने बताया -जहां हिंसा है वहां धर्म नही हो सकता। त्याग धर्म भोग अधर्म। भगवान की आज्ञा में धर्म अनाज्ञा में अधर्म। भगवान महावीर स्वामी की वाणी के आधार पर ही धर्म का शुद्ध स्वरूप बताया। तेरापंथ संघ का प्रवर्तन कर उन्होंने अनुशासन को सर्वाधिक महत्व दिया और मर्यादा, व्यवस्था, संगठन का निर्माण किया। आचरण और अनुशासन की नींव से तेरापंथ को खड़ा किया। भगवान महावीर स्वामी के सिद्धांत को आत्मसात् किया और उन्हें परिभाषित कर साधना का मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने आत्मकल्याण और सत्य के लिए बहुत तप तपा। सत्य के लिए मरना भी मंजूर था। शुद्ध साधना का पथ अपनाया लेकिन विरोधों से कभी डरे नहीं। सम्प्रदाय का मोह, पद की लालसा तथा कठिनाईयां कभी उन्हें विचलित नहीं कर सकी।

धार्मिकता व्यक्ति के व्यवहार में भी होनी चाहिए।सत्य को यथार्थ रुप में स्वीकार करने वाला ही धार्मिक जीवन जी सकता है। आचार्य श्री महाप्रज्ञ द्वारा लिखित भिक्षु विचार दर्शन आचार्य भिक्षु के सिद्धांतों को जानने के लिए सशक्त ग्रंथ है। आगमनिष्ठा , सत्यनिष्ठा भगवान के प्रति समर्पण को ही जीवन का आधार बनाया। मूलभूत आवश्यकताओं का अभाव भी उन्हें अपने पथ से विचलित नहीं कर सकी। यथार्थ सत्य को आत्मसात् किया और फिर उन्हें जनता के सामने प्रस्तुत किया।उनका जीवन अपने आप में मंगल था इसलिए चमत्कारी पुरुष के रूप में आज भी आचार्य भिक्षु का स्मरण किया जाता है। भिक्षु स्वामी का गुणगान ही नहीं बल्कि अनुसरण भी करें।

मीडिया प्रभारी अविनाश जैन ने बताया तेरापंथ सभा मंत्री सुमीत जैन, तेरापंथ युवक परिषद अध्यक्ष अंकित जैन, तेरापंथ महिला मण्डल मंत्री सपना युवराज जैन, महासभा आंचलिक प्रभारी छत्रपाल जैन, महासभा प्रभारी केशवनारायण जैन ने विचारों की प्रस्तुति दी। धम्म जागरण में सामूहिक गीतों का संगान किया गया। 108 श्रावक श्राविकाओं ने उपवास आराधना की। सिंधिकेला, बगुमुंडा के श्रावक समाज सहभागी बने। संघगान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

