कांटाबांजी (वर्धमान जैन): तेरापंथ भवन में आध्यात्मिक प्रवचन देते हुए मुनि प्रशांत कुमारजी ने कहा- साधना और तपस्या से पहले अपने दृष्टिकोण को सम्यग बनाना आवश्यक है । सम्यग दर्शन ही हमारी साधना का मूल आधार है । धर्म – अधर्म , पुण्य – पाप, संयोग – वियोग आदि के संदर्भ में हमारी दृष्टिकोण स्पष्ट रहें । मूल तत्व को समझने के बाद जो धर्म क्रिया या तपश्चर्या की जाती है , वही सार्थक होती है । पारिवारिक शांति के लिए आवश्यक है कि परिवार में दूसरों पर अधिकार जताने की प्रवृति से बचा जाए । सबके साथ मृदुतापूर्ण व्यवहार ही सुखप्रद होता है । आज आदमी के दिमाग में पैसा और पदार्थ इतना हावी हो गया है कि उसके सामने आपसी संबंध भी पीछे हो गए हैं । धन और अन्य भौतिक वस्तुओं के लिए मानवीय गुणों को कभी नहीं छोड़ना चाहिए । इंसानियत का धर्म सबसे पहले जीवन में रहना चाहिए । अहिंसा , दया , प्रेम , क्षमा , मैत्री तथा ईमानदारी ये धर्म के अंग है जो सभी के लिए आवश्यक है । जीवन में इन गुणों का विकास होने पर ही धार्मिक क्रियाएं सुशोभित होती है । भौतिक सम्पदाएँ और साधन – सुविधाएं जीवन चलाने के साधन मात्र है, इन्हें जीवन का साध्य मानने की भूल न करें । भौतिक, आर्थिक विकास की नींव में आध्यात्मिकता के संस्कार रहने आवश्यक है । चातुर्मास का समय आध्यात्मिक चेतना को जगाने का अवसर है । विभिन्न प्रकार से धर्माराधना कर व्यक्ति कर्म निर्जरा करता है । श्रीमति रीना ने एकासन का मासखमण कर खाद्य संयम की साधना की है । श्रीमति बिंदिया के परिवार का माहौल में सेवाभाव एवं गोचरी की भावना प्रबल रहती है । श्रीमति सरोज ने जागरूकता से तपाराधना पूर्ण की है । घर के प्रत्येक सदस्य धर्मसंघ के प्रति समर्पित है । कृष ने छोटी उम्र में तप कर हिम्मत का परिचय दिया है । छोटी वय में ही धार्मिक भावना संस्कारों का असर हैं । दिनेश जी सेवाभावी , साधु – साध्वी के प्रति समर्पित है ।

मुनि कुमुद कुमार जी ने कहा- आदमी के जीवन में सुख – दुख जो भी आते हैं , वे अपने ही कर्मो का फल है । कर्म करते समय जागरूकता रखनी चाहिए की ऐसा कोई कार्य न करें जिससे उसका बूरा फल भोगना पड़े । हमारा वर्तमान जीवन ही हमारे भविष्य को निश्चित करता है । जिसका वर्तमान अच्छा है उसका भविष्य भी अच्छा होता है । ” रहे भीतर जीए बाहर ” यह सूत्र आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी ने अच्छी जीवन शैली अपनाने के लिए दिया जिससे व्यक्ति जीवन का आनन्द ले सकें । भीतर बाहर का संतुलन ही जीवन को सही दिशा देता है । तपस्या करने वाले तपस्वी श्रीमति रीना , श्रीमती बिंदिया, श्रीमती सरोज एवं मास्टर कृष ने कुल का गौरव बढ़ाया है । धर्मसंघ में तपस्वी के रूप में अपना अपना नाम अंकित करें । प्रभु ऋषभ ने सर्वप्रथम तप का संदेश दिया । धर्म का दीपक इसी तरह प्रज्जवलित होता रहे । त्याग के प्रति हमारा भाव बना रहें ।

मीडिया प्रभारी अविनाश जैन ने बताया श्रीमति रीना ने एकासन मासखमण, मास्टर कृष ने अठ्ठाई एवं श्रीमति बिंदिया, श्रीमति सरोज ने अठ्ठाई का प्रत्याख्यान किया । तेरापंध सभा, महिला मण्डल एवं पारिवारिक सदस्यों ‘ ने तपस्वी के प्रति मंगलकामना गीत एवं व्यक्तव्य के द्वारा प्रस्तुत की । अनेक श्रावक ‘ श्राविकाओं ने नियम स्वीकार किए ।

