रूपांतरण शिल्पशाला क्षमायाचना
कांटाबांजी (वर्धमान जैन): मुनि प्रशांत कुमार जीं के सान्निध्य में रूपांतरण शिल्पशाला क्षमायाचना महिला मण्डल द्वारा आयोजित हुई । जनसभा को सम्बोधित करते हुए मुनि प्रशांत कुमार जी ने कहा -क्षमा एक ऐसा शस्त्र है जो हमारे भीतर के शल्य को खत्म कर देता है। मन हल्का हो जाता है, भीतर का भार उतर जाता है। अनेक बीमारियों का कारण भावात्मक विचार होता है । व्यक्ति के भावों का प्रभाव शरीर पर अवश्य आता है। क्षमा जैन तीर्थकरों द्वारा दिया गया अचूक तत्व है जो जीवन जीने की कला सिखाता है। आत्मा को स्वस्थ बनाता है। हमारे मन, विचार एवं व्यवहार को पवित्र बनाता है। अपने आप को पवित्र बनाने का तरीका है क्षमा। श्रमण धर्म के दस द्वार बताए गए जिसमे पहला द्वार क्षमा है। क्षमा के पश्चात् शांति, मुक्ति । बिना क्षमा के शांति नहीं मिलती। क्षमा को नही अपनाने से मन मे वैर रखने से मुक्ति भी नही मिलती है। क्षमा करने के बाद व्यक्ति की पूर्व गलतियों को भूलना उचित होता है। दिमाग को हमेशा खुला एवं प्रसन्न रखना चाहिए।

रिश्ते को मधुर बनाएँगे तभी जीने का आनन्द आता है, नहीं तो व्यक्ति अपना वर्तमान एवं भविष्य दोनो बिगाड देता है। क्षमा एक विज्ञान है जो आपसी रिश्तों को जोड़ने वाला है। क्षमा प्रदान शक्तिशाली व्यक्ति ही कर सकता है। ईट का जबाब पत्थर से देने वाला कायर एवं कमजोर होता है। | क्षमावान ही महान बनता है।रात्रि सोने से पूर्व सभी जीवों से क्षमा मांग लेनी चाहिए। हर समय पूरे संसार के प्रति मंगल भाव रखें। अपने चिंतन एवं विचारों को सकारात्मक बनाए ।

मुनि कुमुद कुमार जी ने कहा- जब तक भीतर में वैर का भाव है तब तक धर्माराधना से हमारा कल्याण नहीं होगा। क्षमा देना और लेना ये दोनो भाव बराबर रहने चाहिए। रोग, आग और वैर तीनों को प्रारम्भ में ही मिटा देना चाहिए। मन की गांठ खुलने से ही आध्यात्मिक एवं व्यवहारिक जीवन सफल एवं सुखद बनता है। वैर का अनुबंध व्यक्ति को जन्मो-जन्मो तक संसार में भटकाता है। सरल मन एवं सरल जीवन दोनो आनन्ददायी होते हैं। धार्मिकता की पहचान क्रिया काण्ड से नही जीवन व्यवहार एवं आचरण से होती है। धर्म हमे जीना सीखाता है। मैत्री, भाइचारे का भाव प्रत्येक धर्म की प्रेरणा है।कार्यक्रम का शुभारम्भ महिला मण्डल के मंगलाचरण से हुआ। विषय प्रस्तुती ज्योति हीरालाल जैन ने दी। आभार ज्ञापन श्रीमति बबीता जैन ने किया। कार्यक्रम का संचालन ऋतु जैन ने किया।

