अशुभ कर्मो से दूर करता प्रतिक्रमण -मुनि प्रशांत
कांटाबांजी (वर्धमान जैन): मुनि प्रशांत कुमार जी के सान्निध्य में रूपांतरण शिल्पशाला का प्रतिक्रमण आधारित महिला मण्डल द्वारा आयोजित हुई। जनसभा को सम्बोधित करते हुए मुनि प्रशांत कुमार जी ने कहा- भगवान महावीर ने हमे जो मार्ग बताया वह है मुक्ति का। दो रास्ते है इसमे एक है मुक्ति की ओर ले जाने वाला जिससे जन्म-मरण का चक्र कम होते-होते मुक्ति जल्दी हो जाती है। दूसरा जन्म-मरण को बढ़ाने वाला उससे मोक्ष दूर हो जाता है। मोक्ष में शाश्वत सुख है। सभी प्राणी सुख चाहते है वास्तविक सुख मिलता है मोक्ष में।शाश्वत सुख की प्रक्रिया है पहली अपनी आत्मशुद्धि करो तभी मोक्ष के नजदीक पहुंचोगे । केवल त्याग तपस्या ही शुद्धि का मार्ग नही है। अपने आप को शुद्ध बनाने का अशुभ कर्मो से दूर होने का उपाय है प्रतिक्रमण। प्रतिक्रमण सुबह एवं शाम दोनो समय करने से निरन्तर आत्म भाव में रमण हो जाता है। प्रतिक्रमण यानि वापिस लौटना। मन वचन एवं काया से हुए कार्यो की समीक्षा करना। छ: आवश्यक बताए गए हैं। भूतकाल का प्रतिक्रमण किया जाता है। वर्तमान काल का संवर कर पाप को रोका जाता है। भविष्य के लिए प्रत्याख्यान किया जाता है।

प्रतिक्रमण में मिच्छामि दुक्कडं शब्द का प्रयोग किया जाता है।यानि मेरे द्वारा किया गया पाप निष्फ़ल हो जाए। इस शब्दावली से पाप हल्का हो जाता है। अपनी गलती को स्वीकार करना और उसे दूर करने का प्रयास करना प्रतिक्रमण है। मन में पश्चाताप का भाव होना यानि छोटा प्रतिक्रमण। जैन श्रावक को प्रतिक्रमण अवश्य करना चाहिए। आत्मसमीक्षा से व्यक्ति के जीवन व्यवहार में बदलाव आता है। आदत एवं विचारों में परिवर्तन ही धार्मिक व्यक्ति की पहचान है।

मुनि कुमुद कुमार जी ने कहा – प्रतिक्रमण है आत्म शुद्धि की प्रक्रिया। अपने मन, भाव एवं आत्मा को पवित्र बनाने के साथ हलुकर्मी करने की साधना हमारे जीवन का लक्ष्य होना चाहिए| श्रावक व्रत को धारण करना एवं प्रतिक्रमण करने का मनोभाव रहना चाहिए। संवत्सरी का प्रतिक्रमण श्रावक का प्रथम कर्त्तव्य होता है। द्रव्य से नही भावों से किया गया प्रतिक्रमण ही सार्थक होता है। श्रावक जीवन में पापभीरुता नहीं है तो श्रावक जीवन के आगे प्रश्न खडा होता है। हिंसा से बचाव, आत्मचिंतन, त्याग की चेतना धार्मिक व्यक्तित्व की पहचान है।

मीडिया प्रभारी संजना जैन ने बताया कार्यक्रम का शुभारम्भ महिला मण्डल के मंगलाचरण से हुआ। श्रीमति सुनिता एन ने विषय प्रस्तुति दी। कार्यक्रम का कुशल संचालन जयमाला छापडिया ने किया। आभार ज्ञापन वंदना अग्रवाल ने किया।

