पाप का अल्पीकरण होता है बारह व्रत से -मुनि प्रशांत
कटिहार (बर्धमान जैन): आचार्य श्री महाश्रमणजी के सुशिष्य मुनिश्री प्रशांत कुमारजी मुनिश्री कुमुद कुमारजी के सान्निध्य में तेरापंथ युवक परिषद कटिहार द्वारा बारह व्रत कार्यशाला आयोजित हुई। जनसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री प्रशांत कुमारजी ने कहा – श्रावक होना अपने आप में श्रेष्ठ होता है। श्रेष्ठता आती है त्याग से। भगवान महावीर स्वामी ने जो जीवनशैली बताई वह जीवन जीने की कला है। बारह व्रत से पाप का अल्पीकरण होता है। बारह व्रत धारण करने से ही श्रावक की कोटी में आते है। श्रावक अल्प परिग्रह, अल्प हिंसा का जीवन जीने का प्रयास करें। नियम व्रत की अनुपालन जीवन व्यवहार को सम्यग् बनाते है।संयम की साधना से कर्म निर्जरा होती है। श्रावक का आचरण, व्यवहार प्रेरणादायक होता है। भगवान महावीर ने संयम के सिद्धांत पर बल देते हुए कहा कि इच्छाओं का संयम करो और भोगोपभोग की सीमा करो।यह संयम और सीमाकरण का सिद्धांत आज के समय में बहुत उपयोगी और आवश्यक है।अपनी आवश्यकताओं को संकल्प पूर्वक सीमित कर लेना एक स्वस्थ जीवनशैली का लक्षण है।

मुनिश्री कुमुद कुमारजी ने कहा – बारह व्रत श्रावक का सुरक्षा कवच होता है।जब तक जीवन में व्रत नहीं होता है तब तक श्रावक नहीं होते है।व्रत की चेतना से आत्मबल मनोबल बढ़ता है। श्रावक एक सीमा में पदार्थों का उपयोग करता हुआ जीवन जिएं।अव्रत पाप का द्वार खोलता है।व्रत बंधन मुक्ति का उपाय है। संयम सादगी पापभीरुता का माध्यम बनता है।उपासक दशा आगम में श्रावकों के जीवन दर्शन का वर्णन मिलता है। राहुल सुराणा ने बताया- कार्यशाला का शुभारंभ तेरापंथ युवक परिषद के सदस्यों द्वारा विजय गीत से हुआ।श्रेयांस पुगलिया ने विषय प्रस्तुति दी। आभार तेयुप सहमंत्री निशांत संचेती ने किया। कार्यशाला का कुशल संचालन मुनिश्री कुमुद कुमारजी ने किया।

