हम और हमारे रिश्ते कार्यशाला आयोजित

रिश्ते निभाने का प्रशिक्षण आवशयक -मुनि प्रशांत

जयगांव (बर्धमान जैन): मुनिश्री प्रशांत कुमार जी मुनिश्री कुमुद कुमार जी के सान्निध्य में हम और हमारे रिश्ते कार्यशाला आयोजित हुई। जनसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री प्रशांत कुमार जी ने कहा – कुछ रिश्ते जन्म से बनते है। जन्म लेते ही अनेक रिश्ते बन जाते है। कुछ बाद में बनते है। परिवार का रिश्ता जन्म से जुड़ा होता है। रिश्ते निभाने का प्रशिक्षण होना बहुत आवश्यक है। बड़ों का छोटों के साथ एवं छोटों का बड़ों के साथ कैसा व्यवहार करना। वर्तमान समय में शिक्षा का विकास बहुत हुआ है लेकिन परिवार टूटते जा रहे हैं। शिक्षा केवल आजीविका का साधन बन कर रह गई है। जीवन की शिक्षा नहीं मिल रही है। परिवार के प्रति कर्तव्य भूलते जा रहे है। परिवार के सम्यक निर्वाह एवं सुखी बनाने में महिला की अहम् भूमिका रहती है। एक दूसरे को अपनापन दे। श्री राम से सीखा जा सकता है कि कर्तव्य का पालन कैसे किया जाता है। जहां परिवार में अधिकार एवं न्याय की बात की जाती है वहां परिवार टूटता है। विचार मिले या ना मिले लेकिन परिवार नही टूटना चाहिए। व्यक्ति का चिंतन रहें कि मुझे अपने परिवार को सुखी बनाना है। परिवार में कैसे प्रेम से रह सकते है। मेरे कारण से परिवार के किसी भी सदस्य को तनाव न हो। एक दूसरे के प्रति हमारा नजरिया अच्छा रहे। परिवार के प्रत्येक सदस्य को धन्यवाद दे। व्यक्ति का व्यवहार परिवार को चलाने में बहुत महत्वपूर्ण होता है।

मुनिश्री कुमुद कुमार जी ने कहा – जीवन को जीना सीखें। रिश्ते बनाना आसान है लेकिन उन्हें निभाना कठिन होता है। परिवार वह होता है जहा एक से अनेक सदस्य सौहार्दपूर्ण वातावरण में एक साथ रहते है। एक दूसरे के सहयोगी बनते है।सुख दुख में साथ निभाते है। बड़े छोटों को वात्सल्य दें और छोटे बड़ों के प्रति विनय का भाव रखें तो वह घर स्वर्ग बन जाता है। जन्म कहां लेना व्यक्ति के हाथ में नहीं है लेकिन जीवन कैसे जीना वह स्वयं के हाथ में है। रिश्तों की अहमियत एवं अनुकरणीय प्रेरणा रामायण से बहुत ही मार्मिक तरीके से मिलती है। प्राचीन गुरुकुल पद्धति जीवन निर्माण की पद्धति होती थी। सभा अध्यक्ष गणेश सरावगी ने सभी आगंतुकको का स्वागत किया। सभा द्वारा सम्मानित किया गया।

Sunil Kumar Dhangadamajhi

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