चातुर्मासिक चतुर्दशी
सिलचर (बर्धमान जैन): चातुर्मासिक चतुर्दशी पर जनसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री प्रशांत कुमार जी ने कहा – आगम शास्त्र में उपलब्ध मर्यादा में एक मर्यादा है साधु चार महीने एक स्थान पर प्रवास करें। ये साधु की मौलिक मर्यादा है। चातुर्मास में साधु साध्वी अपनी अहिंसा की साधना का सजगता से, सम्यक रूप से पालन कर सकें। चातुर्मास का समय अधिक से अधिक आध्यात्मिक साधना का होता है।साधु का निमित्त पाकर श्रावक भी अपने जीवन में आध्यात्मिकता का विकास करें। त्याग प्रत्याख्यान करें।संवर की साधना करें। ज्ञान दर्शन चारित्र एवं तप की वृद्धि हो यह श्रावक का मनोभाव रहना चाहिए। सामायिक में समय का नियोजन करना है।पौषध प्रतिक्रमण के द्वारा कर्म की महान निर्जरा होती है। चातुर्मास का संदेश है – मैं भीतर जाऊं, तुम भीतर जाओ। यानी मैं भी तर जाऊं, तुम भी तर जाओ। इस सूत्र से साधु एवं श्रावक अपना कल्याण कर सकता है। धर्म की बढ़ोतरी जीवन में होती रहें। चिंतन रहे कि पिछले वर्ष से इस बार अधिक आत्मसाधना करनी है तभी चातुर्मास की सार्थकता है। मुनि श्री ने हाजरी का वाचन परिषद में किया।

मुनिश्री कुमुद कुमार जी ने कहा – चातुर्मासिक चतुर्दशी पक्खी का अपना विशेष महत्व होता है। भगवान महावीर ने संघ में व्यवस्था के लिए सात पदों की व्यवस्था की। आचार्य श्री भिक्षु ने संघ में मर्यादा, व्यवस्था, अनुशासन को महत्व दिया। संविधान बनाकर संघ को सुदृढ़ एवं सुरक्षित बना दिया।आज चौमासी पक्खी है। इसका अपना महत्व है।आज प्रतिक्रमण के पश्चात् चातुर्मास प्रारम्भ हो जाएगा। चातुर्मास में जमीकंद,सचित, रात्रि भोजन का त्याग करके अपनी आत्मा को हलुकर्मी बनाएं।

