कविता: कविता की कहानी

 

है प्रलंबित
धूप में
दीर्घश्वास
उनके जीने की चिंता ।
अस्वाभाविक जीवन में
टाइमपास के लिए
कितनी हैं घटनाएं ।
उसे देखा जिस दिन से
ऐसा लग रहा है
चमकीला है
रूप बाहर
अंदर है घनीभूत
दुःख के बादल ।

✒️मूल ओड़िया: प्रफुल्ल चंद्र पाढ़ी

✍🏾अनुवाद : ज्योति शंकर पण्डा

Sunil Kumar Dhangadamajhi

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