पुरंदर किले का इतिहास क्यों है इतना खास ?

पुरन्दर किला का महत्त्व सम्पूर्ण मराठा इतिहास में रहा है। शिवाजी की रणनीतिक कुशलता सुदृढ़ दुर्गों पर आधारित थी। पूना में शिवाजी के निवास स्थान की सुरक्षा जिन दो मज़बूत क़िलों से होती थी, उनमें से एक पुरन्दर का क़िला था, दूसरा दक्षिण-पश्चिम में सिहंगढ़ का क़िला था। पुरंदर किला महारास्ट्र के पुणे में पश्चिमी घाट पर स्थित है। समुद्र तल से पुरंदर किले की ऊंचाई 4472 फीट है। पुरंदर का किला पर्यटकों के लिए सुबह 9 बजे से शाम के शाम 5 बजे तक खुला रहता हैं। पर्यटक किसी भी दिन किले की यात्रा पर जा सकते हैं।

पुरंदर किला संभाजी राजे भोसले का जन्मस्थान है। पुरंदर किले को दो अलग-अलग खंडो में विभाजित किया गया हैं और किले के निचले हिस्से को माची नाम से जाना जाता हैं। माची के उत्तरी हिस्से में एक छावनी और एक वेधशाल बनी हुई है। पुरंदर किले में एक मंदिर है जोकि भगवान पुरंदरेश्वर को समर्पित है।

पुरंदर किले का इतिहास

पुरंदर का विशाल दुर्ग का निर्माण दसवीं शताब्दी में चंद्रवंशी क्षत्रिय गवली अभीर साम्राज्य के यादव राजाओं ने करवाया था। यादवों ने यहां 13वी शताब्दी तक शासन किया था। देवगिरी, रायकोट, पुरंदर, कोंढाना, असीरगढ़, गवली गढ़ आदि खूबसूरत और विशाल दुर्गों का निर्माण खानदेश प्रांत और इसके इर्द गिर्द “गवली अभीर साम्राज्य” के यदुवंशी हुक्मरानों ने ही साम्राज्य के चाक चौबंद के लिए करवाया था। 13वी शताब्दी के अंत में यहां के यादव नरेषों और आक्रमणकारी मुसलमान शासकों के बीच घमासान युद्ध हुआ था। छल से यादवों को परास्त करने के बाद यह किला मुस्लामनो ने हथिया लिया और इसपर लंबे अरसे तक बीजापुर के नवाब का आधिपत्य हो गया।

इतिहासकारों के अनुसार पुरंदर किले को गिरने से बचाने और संरक्षक देवता को प्रसन्न करने के लिए गढ़ के नीच एक पुरुष और एक महिला को जिन्दा दफन किया गया था। 1670 में शिवाजी राजे को इसका जागीरदार नियुक्त किया गया लेकिन वह ज्यादा दिन तक टिक नही सके। लेकिन पांच वर्ष के अन्तराल के बाद शिवाजी महाराज ने औरंगजेब के खिलाफ विद्रोह कर इस किले को अपने हाथ में ले लिया।

पुरंदर नाम देवराज इंद्र के नाम पर रखा गया था। यादव वंश ने अपने शासन के दौरान अपने कुलदेवता भगवान श्री कृष्ण का नरायानेश्वर मंदिर का निर्माण तथा पुरंदेश्वर महादेव के मन्दिर का निर्माण करवाया जो आज भी यहां मौजूद है।

पुरंदर किले की आकर्षित मूर्तियों में मुरारजी देशपांडे की खूबसूरत प्रतिमा पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। पुरंदर किले की वास्तुकला देखने लायक हैं किलो को दो भागो में बांटा गया हैं। माची के निचले स्तर से होते हुए सीढ़ी ऊपरी स्तर पर बाल्ले किला की ओर जाती है। किले के अन्दर एक दिली द्वार है जोकि बाल्ले किला की पहली संरचना के रूप में जाना जाता है। प्राचीन केदारेश्वर मंदिर भी किला का आकर्षण हैं। पुरन्दर का किला शिवाजी महाराज और अंग्रेजो के बीच के संघर्ष का गवाह बना है। लेकिन जब अंग्रेजो ने इस किले पर विजय प्राप्त कर ली तब यहाँ एक चर्च का निर्माण भी किया गया था।

Sunil Kumar Dhangadamajhi

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2 thoughts on “पुरंदर किले का इतिहास क्यों है इतना खास ?

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